लंगड़ा आम ‘लंगड़ा’ नहीं होता तो क्यों रखा गया ये नाम, क्या है इसकी कहानी?

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Langra Mango: भारत में पाई जाने वाली आम की कई मशहूर किस्मों में से लंगड़ा आम अपने अनोखे स्वाद और खुशबू की वजह से एक खास जगह रखता है. हालांकि जो बात कई लोगों को हैरान करती है वह है इसका अजीब सा नाम. आम तो बिल्कुल सामान्य होता है लेकिन इसके बावजूद भी इसे लंगड़ा कहा जाता है. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

बनारस के एक साधु से जुड़ी कहानी 

इस मशहूर आम के पीछे की कहानी लगभग 250 से 300 साल पुरानी है. स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक कई सदियों पहले एक घुमक्कड़ साधु बनारस के पास के एक छोटे से गांव आया था. उसने उस इलाके में बने एक छोटे से शिव मंदिर में रहना शुरू कर दिया. वह अपना दिन वहीं ध्यान और पूजा-पाठ में बिताने लगा.

गांव छोड़ने से पहले साधु ने मंदिर परिसर के अंदर आम का एक पौधा लगाया और अनजाने में ही उसने उस चीज की नींव रख दी जो भारत की सबसे मशहूर आम के किस्मों में से एक बनने वाली थी.

मंदिर के पुजारी ने पेड़ की देखभाल की 

मंदिर के पुजारी ने साधु के वहां रहने के दौरान उनकी काफी श्रद्धा और सम्मान के साथ सेवा की. साधु पुजारी की निष्ठा से काफी प्रसन्न हुआ और उन्होंने गांव से जाते समय उस आम के छोटे पौधे की देखभाल करने की जिम्मेदारी पुजारी को सौंप दी. लेकिन गांव छोड़ने से पहले साधु ने एक जरूरी शर्त भी रखी. पेड़ पर लगने वाले फल सिर्फ पुजारी ही खा सकते थे और उन्हें पेड़ की कलम या फिर टहनियां किसी और के साथ बांटने की इजाजत नहीं थी. 

कैसे पड़ा लंगड़ा आम का नाम? 

कहा जाता है कि मंदिर के पुजारी के एक पैर में कोई शारीरिक कमी थी जिस वजह से वह साफ तौर पर लंगड़ा कर चलते थे. जब आखिरकार पेड़ पर फल लगने लगे तो लोग आम की जबरदस्त मिठास, खुशबू और बनावट को देखकर हैरान रह गए. गांव वालों ने जल्द ही इसे लंगड़े पुजारी का आम कहना शुरू कर दिया. समय के साथ यह लंबा नाम धीरे-धीरे छोटा होता गया और आम को बस लंगड़ा आम कहा जाने लगा. 

स्वाद की वजह से हुआ मशहूर 

अजीब नाम होने के बावजूद भी लंगड़ा आम अपने जबरदस्त स्वाद और अनोखी खुशबू की वजह से काफी जल्दी मशहूर हो गया. इसका मुलायम गूदा, कम रेशे और संतुलित मिठास ने इसे न सिर्फ उत्तरी भारत में बल्कि धीरे-धीरे पूरे देश में काफी लोकप्रिय बना दिया.

एक राजा ने इस किस्म को फैलाया 

कहानी में आगे यह भी कहा गया है कि पुजारी ने साधु की शर्त का पूरी ईमानदारी से पालन किया और पेड़ की कलम किसी के साथ भी साझा करने से मना कर दिया. हालांकि जब बनारस के राजा ने इस आम के बेमिसाल स्वाद के बारे में सुना तो उन्होंने गुपचुप तरीके से उस पेड़ की एक कलम अपने शाही बगीचे में लगवाने का इंतजाम किया. वहां से लंगड़ा आम दूसरे इलाकों में भी फैलना शुरू हो गया.

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